बाज़ारों में मंदी - मेरा नज़रिया
क्या इसके लिए कही यह वजह तो नही है !
बाज़ारों में मंदी - मेरा नज़रिया
बाज़ारों में मंदी - मेरा नज़रिया
जब से पढाई पूरी कर के इस दुनिया मे कमाई की तलाश में सफर शुरु किया है तब से यही सुनते आ रहे है कि बाज़ार में मंदी बहुत है। जिस किसीको सुनते है, पहली बात मंदी की ही करते है। हालांकि इनकी जीवन शैली पहले से बेहतर होती रहती है।
मेरा यह मान ना है कि मंदी इतनी भी नही है जितनी लोग बढ़ा-चढ़ाकर बोलते रहते है।
हा, इतना जरूर कह सकते है कि अगर एक सामान्य आदमी से लेकर बड़े बड़े लोग अपनी रोजगारी को कैसे चला रहे होते हैं, काफी कुछ उस पर भी निर्भर करता है।
उदाहरण के रूप में,
मैंने कई ऑटो वाले को देखा है कि ऑटो स्टैंड पर खाली ही बैठे होते है, लेकिन जब कोई पैसेंजर आता है तो किराया बढ़ा चढाकर बोलतें है, और ऊपर से जब तक फूल सवारी ना हो जाये तब तक एक या दो पैसेन्जर को नही ले जाते,
इसी के कारण आज Ola, Uber ... जैसी कंपनियां अस्तित्व में आई।
BSNL जैसी टेलिकॉम कंपनी अपने ग्राहकों को अच्छी सुविधा ना दे पाने के चलते आज कई प्राइवेट कंपनियों का आगमन हो गया है और सस्ते दरो की कॉल्स देने की होड़ मची है।
कुछ दुकानदार दो गुना - तीन गुना पैसा लेकर भी अच्छी गुणवत्ता वाला सामान नही देते। जिसके फल स्वरुप आज तरह तरह के मॉल्स और डिपार्टमेंटल स्टोर्स का आगमन हुआ।
कुछ दुकानदार अपनी दुकान में जरुरत से ज्यादा खर्चा करके अपनी दुकान को इतनी चकाचोंद बना देते है, ताकि उस दुकान को बाहर से देखते ही आम आदमी दुकान के अंदर जाने से पहले सोचने को मजबूर हो जाता है।
तो कुछ दुकानदार अपने दुकान के गेट पर बोर्ड़ लगा देते है,
"कृपया जूते बाहर निकाले".
अब आज के हरिफाई वाले बाज़ार में कुछ ग्राहक के पास जूते निकालने का भी वक्त नही होता।
मैंने देखा है अक्सर यह बोलते हुए की, छोड़ो, दुकान के अंदर जाना है तो जूते निकालने पड़ेंगे, और वह किसी और दुकान मैं चले जाते है। और दुकानदार यही बोलते रहते है कि ग्राहक ही नही दिखते पहले जैसे, बहुत मंदी है।
वैसे ही सरकारी स्कूल, अस्पताल वग़ैरह को भी देख लीजिए,
अच्छी शिक्षा, सुविधाएं, लापरवाही, गैरजिम्मेदाराना रवैय्या आदि के कारण आज प्राइवेट स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों की भरमार है।
सरकारी बैंकों के ढ़ीले ढ़ीले काम करने के तरीके, ग्राहको को बहुत परेशानियों से गुजरना पड़ता है जिसके फलस्वरूप प्राइवेट बैंकों की भरमार है।
लेकिन अगर जीवनशैली की बात करे तो आज हर आम आदमी के हाथो में महंगे महंगे मोबाइल फोन है, पिज़्ज़ा बर्गर के आदि हो गए है, मॉल्स में खरीदारी करने में अपनी शान समझते हैं, अपने पसंदीदा अभिनेता/अभिनेत्रियों की फिल्में देखने के लिए कितने महंगे टिकट खरीद लेते है।
एक उदाहरण के सहारे आपको समजाने की कोशिश करता हूँ। मेरे शहर में टू-व्हीलर गाड़ियों के कई शोरूम है। हम किसी एक ही शोरूम की बात करते है, उदाहरण के रूप मे बजाज कंपनी का एक शोरूम की ही बात करता हूँ।
सामान्यतः कोई भी आम आदमी जो महंगे महंगे मोबाइल रखते है, वह अगर नई बाइक लेनी हो तो १०,०००/- १५,०००/- के डाउन पेमेन्ट पर गाड़ी खरीद लेते है। ऐसे अगर इस एक शोरूम की बात करे तो पूरे महीने में यह क़रीब १००/२०० गाड़िया हर महीने बेच देते है, तो सोचो पूरे शहर में बाकी कंपनियों के हर शोरूम कितनी गाड़िया बेचते होंगे? यह तो सिर्फ टू व्हीलर गाड़ियों की बात हुई, फोर व्हीलर गाड़ियों का भी आप गणित निकाल सकते हो।
कहने का मतलब यह है कि मैंने जो देखा और महसूस किया है वह यह है कि मंदी जैसा लोग बढ़ा चढ़ाकर बता रहे है वैसा हकीकत में नही होता।
दोस्तो, यह तो सिर्फ मेरा नज़रिया है, जो मैंने देखा और समझा है वह आपको बताया।
हो सकता हैं आप मेरे नज़रिये से या मेरी बात से सहमत ना भी हो।
लेकिन इस बारेमें आप क्या सोच रखते हों, कमेन्ट बॉक्स में जरूर बताएं।
मेरी इस पोस्ट को पूरा पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।
कुछ दुकानदार दो गुना - तीन गुना पैसा लेकर भी अच्छी गुणवत्ता वाला सामान नही देते। जिसके फल स्वरुप आज तरह तरह के मॉल्स और डिपार्टमेंटल स्टोर्स का आगमन हुआ।
कुछ दुकानदार अपनी दुकान में जरुरत से ज्यादा खर्चा करके अपनी दुकान को इतनी चकाचोंद बना देते है, ताकि उस दुकान को बाहर से देखते ही आम आदमी दुकान के अंदर जाने से पहले सोचने को मजबूर हो जाता है।
तो कुछ दुकानदार अपने दुकान के गेट पर बोर्ड़ लगा देते है,
"कृपया जूते बाहर निकाले".
अब आज के हरिफाई वाले बाज़ार में कुछ ग्राहक के पास जूते निकालने का भी वक्त नही होता।
मैंने देखा है अक्सर यह बोलते हुए की, छोड़ो, दुकान के अंदर जाना है तो जूते निकालने पड़ेंगे, और वह किसी और दुकान मैं चले जाते है। और दुकानदार यही बोलते रहते है कि ग्राहक ही नही दिखते पहले जैसे, बहुत मंदी है।
वैसे ही सरकारी स्कूल, अस्पताल वग़ैरह को भी देख लीजिए,
अच्छी शिक्षा, सुविधाएं, लापरवाही, गैरजिम्मेदाराना रवैय्या आदि के कारण आज प्राइवेट स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों की भरमार है।
सरकारी बैंकों के ढ़ीले ढ़ीले काम करने के तरीके, ग्राहको को बहुत परेशानियों से गुजरना पड़ता है जिसके फलस्वरूप प्राइवेट बैंकों की भरमार है।
लेकिन अगर जीवनशैली की बात करे तो आज हर आम आदमी के हाथो में महंगे महंगे मोबाइल फोन है, पिज़्ज़ा बर्गर के आदि हो गए है, मॉल्स में खरीदारी करने में अपनी शान समझते हैं, अपने पसंदीदा अभिनेता/अभिनेत्रियों की फिल्में देखने के लिए कितने महंगे टिकट खरीद लेते है।
एक उदाहरण के सहारे आपको समजाने की कोशिश करता हूँ। मेरे शहर में टू-व्हीलर गाड़ियों के कई शोरूम है। हम किसी एक ही शोरूम की बात करते है, उदाहरण के रूप मे बजाज कंपनी का एक शोरूम की ही बात करता हूँ।
सामान्यतः कोई भी आम आदमी जो महंगे महंगे मोबाइल रखते है, वह अगर नई बाइक लेनी हो तो १०,०००/- १५,०००/- के डाउन पेमेन्ट पर गाड़ी खरीद लेते है। ऐसे अगर इस एक शोरूम की बात करे तो पूरे महीने में यह क़रीब १००/२०० गाड़िया हर महीने बेच देते है, तो सोचो पूरे शहर में बाकी कंपनियों के हर शोरूम कितनी गाड़िया बेचते होंगे? यह तो सिर्फ टू व्हीलर गाड़ियों की बात हुई, फोर व्हीलर गाड़ियों का भी आप गणित निकाल सकते हो।
कहने का मतलब यह है कि मैंने जो देखा और महसूस किया है वह यह है कि मंदी जैसा लोग बढ़ा चढ़ाकर बता रहे है वैसा हकीकत में नही होता।
दोस्तो, यह तो सिर्फ मेरा नज़रिया है, जो मैंने देखा और समझा है वह आपको बताया।
हो सकता हैं आप मेरे नज़रिये से या मेरी बात से सहमत ना भी हो।
लेकिन इस बारेमें आप क्या सोच रखते हों, कमेन्ट बॉक्स में जरूर बताएं।
मेरी इस पोस्ट को पूरा पढ़ने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया।
हा, पोस्ट अच्छी लगे तो शेयर भी कर सकते हो।
-राकेश पारेख
Yes I'm agree with ur thought... लोग सिर्फ अपने nzriye से aaspass के माहौल को देखते है just fr their convenience... Reality is far away.. Its really nyc to read ur thought.. Thank u
ReplyDeleteThanks for your valuable feedback
DeleteWell written 👏👏
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